July 19, 2024
Banana cultivation: Tissue culture technique will increase the profit of banana cultivation, farmers should know its features and benefits

केले की खेती: टिशू कल्चर तकनीक से केले की खेती का मुनाफा बढ़ेगा, किसान जानें इसकी विशेषताएं और फायदे

केले की टिशू कल्चर पौध खेती एक आधुनिक तकनीक है, जो किसानों को अधिक उत्पादन और मुनाफा देती है। इस विधि से तैयार पौधे रोगमुक्त, उच्च गुणवत्ता और एक समान फल के साथ प्रति पौधे अधिक उपज देते हैं। केले की खेती करने वाले किसान टिशू कल्चर से तैयार पौधे लगाकर बेहतर मुनाफा कमा सकते हैं।

टिशू कल्चर के जरिए केले की खेती में बंपर उत्पादन पाने की एक बेहतर तकनीक है, जो पुरानी केले की किस्मों की खेती की कई चुनौतियों का समाधान करती है। इस विधि से उच्च गुणवत्ता वाले, एक समान और रोगमुक्त पौधे तैयार होते हैं। इससे केले की पैदावार और गुणवत्ता दोनों में सुधार होता है और किसानों को अधिक मुनाफा मिलता है। पिछले कुछ वर्षों में टिशू कल्चर विधि से केले की उन्नत प्रजातियों के पौधे तैयार किए जा रहे हैं। इस विधि से तैयार पौधों से केले की खेती करने के कई फायदे हैं। केले की खेती करने वाले किसान टिशू कल्चर से तैयार पौधे लगाकर बेहतर मुनाफा कमा सकते हैं।

टिशू कल्चर केले के पौधों की विशेषताएं

डॉ. एस.के. डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा समस्तीपुर के पौधा रोग विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष और आईसीएआर-एआईसीआरपी (फल) परियोजना के प्रधान अन्वेषक डॉ. केके सिंह कहते हैं कि ऊतक संवर्धन के जरिए तैयार केले के पौधे स्वस्थ होते हैं और उनमें रोग नहीं लगते। फलों का आकार, प्रकार और गुणवत्ता एक जैसी होती है। ऊतक संवर्धन के पौधों में लगभग 60 दिन पहले फल लग जाते हैं। पहली फसल 12-14 महीने में प्राप्त हो जाती है, जबकि परंपरागत पौधों में 15-16 महीने लगते हैं। ऊतक संवर्धन के जरिए तैयार पौधों की औसत उपज प्रति पौधा 30-35 किलोग्राम तक हो सकती है। वैज्ञानिक तरीके से खेती करने पर 60 से 70 किलोग्राम तक लौकी प्राप्त की जा सकती है। पहली फसल के बाद दूसरी फसल (पेड़ी) 8-10 महीने में आती है टिशू कल्चर के पौधे खरीदते समय किसान इस बात का रखें ध्यान

डॉ. एसके सिंह ने केले की खेती करने वाले किसानों को सुझाव दिया कि जब वे नर्सरी से टिशू कल्चर के पौधे खरीद रहे हों तो ध्यान रखें कि अच्छे टिशू कल्चर के पौधे की ऊंचाई कम से कम 30 सेमी और तने की मोटाई 5.0-6.0 सेमी होनी चाहिए। नर्सरी के पौधे में 5-6 सक्रिय स्वस्थ पत्तियां और 25-30 सक्रिय जड़ें होनी चाहिए, जिनकी लंबाई 15 सेमी से अधिक होनी चाहिए। पॉली बैग की लंबाई 20.0 सेमी, व्यास 16 सेमी और उसका वजन 700-800 ग्राम होना चाहिए।

टिशू कल्चर केले के पौधे कैसे बेहतर हैं?

डॉ. एसके सिंह के अनुसार, सभी पौधे आनुवंशिक रूप से मूल पौधे के समान होते हैं और रोगाणुओं से मुक्त होते हैं। ये पौधे पारंपरिक पौधों की तुलना में अधिक तेजी से और तेजी से बढ़ते हैं। फल जल्दी लगते हैं और इनकी उपज क्षमता अधिक होती है। रोपण उच्च घनत्व तरीके से किया जा सकता है, जिससे रासायनिक इनपुट की आवश्यकता कम हो जाती है। ये पौधे सूखे और तापमान में उतार-चढ़ाव जैसे तनावों के प्रति अधिक सहनशील होते हैं। नई और उन्नत किस्में तेजी से बढ़ती हैं।

केले की रोपाई कब और कैसे करें?

खेत तैयार करते समय 50 सेमी गहरा, 50 सेमी लंबा और 50 सेमी चौड़ा गड्ढा खोदा जाता है। बारिश शुरू होने से पहले यानी जून के महीने में खोदे गए गड्ढों में 8 किलो कम्पोस्ट खाद, 150-200 ग्राम नीम की खली, 250-300 ग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट आदि डालकर मिट्टी भर दी जाती है। अगस्त के महीने में इन गड्ढों में केले के पौधे रोपे जाते हैं। आमतौर पर पौधे 1.6 x 1.6 मीटर की दूरी पर रोपे जाते हैं, यानी लाइन से लाइन की दूरी 1.6 मीटर और पौधे से पौधे की दूरी 1.6 मीटर होती है। इस तरह एक एकड़ में 1560 पौधे रोपे जाते हैं।

उच्च घनत्व वाले पौधे लगाने से मिलता है अधिक मुनाफा

उच्च घनत्व वाले पौधे लगाने की विधि में 1.2 x 1.2 मीटर की दूरी पर पौधे रोपे जाते हैं, जिसमें एक एकड़ में 2000 पौधे रोपे जाते हैं। यदि अधिक पौधे लगाए जाएं तो स्वाभाविक रूप से प्रति एकड़ अधिक उपज प्राप्त होगी। केले की खेती में भूमि की उर्वरता के अनुसार प्रति पौधे 300 ग्राम नाइट्रोजन, 100 ग्राम फास्फोरस तथा 300 ग्राम पोटाश की आवश्यकता होती है। पोटाश की पूरी मात्रा तथा फास्फोरस की आधी मात्रा रोपण के समय तथा शेष आधी मात्रा रोपण के बाद देनी चाहिए। नाइट्रोजन की पूरी मात्रा को पांच भागों में बांटकर अगस्त, सितंबर, अक्टूबर तथा फरवरी-अप्रैल में देना चाहिए।

केले की खेती में आधुनिक तकनीक अपनाकर किसान कम लागत में अधिक उत्पादन कर भारी मुनाफा कमा सकते हैं। टिशू कल्चर के माध्यम से केले की खेती एक परिवर्तनकारी दृष्टिकोण है जो पारंपरिक तरीकों की चुनौतियों का समाधान करता है। उच्च गुणवत्ता वाले, एक समान तथा रोग मुक्त पौधे न केवल उत्पादकता बढ़ाते हैं बल्कि टिकाऊ तथा लाभदायक खेती में भी योगदान देते हैं।

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